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वीरकॉन
प्रोपीकोनाजोल  25 %

वीरकॉन एक अंतरप्रवाही फफूंदनाशक है। वीरकॉन छिड़कने पर यह पत्तियों द्वारा सोख लिया जाने के बाद उसकी नसों द्वारा अतःप्रवाहित हो कर पौधें में सर्वत्र फैल जाता है जिसके प्रभाव से नाशी फफूंदों में अर्गोस्टिरोल नहीं बन पाने पर वे नष्ट हो जाती हैं। इसका प्रयोग रोग के लिए अनुकूल वातावरण होने की दशा में एतिहात के रूप में या रोग के लक्षण प्रगट होते ही प्रयोग करना रोग नियंत्रण में अत्यन्त प्रभावी होता है।

उपयोग तालिका
प्रमुख फसलें नियंत्रित होने वाले रोग मात्रा
(प्रति एकड़)
विशेष
गेहूँ फ्लेग स्मट , लीफ
स्मट , करनाल बंट
छाछिया रोग
 
200 ग्राम
  1. 200  लीटर पानी के घोल में दोपहर बाद छिड़काव करें।
  2.  फ्लेग स्मट की रोकथाम के लिए फसल में फ्लेग लीफ आना प्रारंभ होते ही करें।
जौ स्मट व छाछिया रोग
 
200 ग्राम
मटर व साग-सब्जियां छाछिया रोग 200 ग्राम वीरकॉन के प्रतोग के 15 दिन बाद ही फलों की तुड़ाई करें।
धान धान भूरा पत्ती धब्बा रोग, शीट ब्लाईट रोग, फाल्स स्मट, व बंट से रोग  150 मिली रोग के लक्षण दिखने पर या फसल रोपाई के 35 से 40 दिन बाद 150 - 200 लीटर पानी में घोल कर फसल पर छिड़कें। रोग की तीवृता होने पर प्रथम छिड़काव तीन सप्ताह बाद इसे दोहराऐं।
गन्ना स्मट रोग और अच्छे उगाव हेतु  250 मिली 250 ग्राम वीरकॉन 100 लीटर पानी  में घोल कर गन्ने के टुकड़ों को बुआई से पहले कुछ मिनट तक भिगो कर बाहर निकाल कर उपचारित करे।
 
 
टिप्पणी - साग - सब्जियों पर दो बार से अधिक इस रसायन का प्रयोग न करें।
 
वीरकॉन द्वारा नियन्त्रित रोग

भूरा पत्ती धब्बा रोग धान का शीथ ब्लाइट रोग गन्ने का स्मट रोग
उत्तम उत्पाद

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