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आम की उत्तम खेती
 
 
मिट्टी एवं जलवायु क़िस्में प्रवर्धन
रोपाई उर्वरकों का प्रयोग सिंचाई
हानिकारक कीट प्रमुख रोग फलों की तुड़ाई

फलों का राजा आम हमारे देश का सबसे महत्वपूर्ण फल है।इसकी खेती उत्तर प्रदेश, बिहार, आन्ध्र प्रदेश, पश्चिमी बंगाल, तमिलनाडु, उडीसा, महाराष्ट्र, और गुजरात में व्यापक स्तर पर की जाती है।आम की फ़सल बागवानी हेतु कुछ जानकारी नीचे दी गई है।

जलवायु और मिट्टी सम्बन्धी आवश्यकताएं

आम के लिए गहरी तथा अच्छी जल निकास वाली मिट्टी उपयुक्त मानी गई है।मिट्टी का पी.एच.मान 6.5-7.5 के बीच सही माना गया है।आम का सफल उत्पादन पोषण जलवायु में किया जा सकता है।बौर, फूल आने की अवस्था में वर्षा होने या बदली छाई रहना आम की फ़सल के लिए नुकसानदेय होत है।यह पुरे देश में सफलतापूर्वक उगाया जाता है।आम पाले के लिए अति संवेदनशील है अतः बाग़ को शुरू के कुछ वर्षों में पले से बचाना अति आवश्यक है।

क़िस्में

देश के विभिन्न भागों के लिए भिन्न- भिन्न व्यापारिक क़िस्में उपयुक्त पाई गई हैं।क्योंकि आम की कोई भी एक क़िस्म देश की हर जलवायु में सामान पैदावार नहीं देती है।उत्तर भारत की स्वादिष्ट क़िस्में हैं-दशहरी, लंगडा, चौसा,सफेदा, नीलम और बंबई ग्रीन। पूसा संसथान द्वारा मल्लिका और आम्रपाली नामक आम की दो नई क़िस्में जारी की गई हैं।इन क़िस्मों की विशेषता है की इनमें उच्च कोटि के फल लगते हैं और फल हर साल आते हैं।

प्रवर्धन ( कलम लगाना)

आम का प्रवर्धन मुख्यतः भेंट कलम बांधकर किया जाता है।लेकिन विनियर कलम लगाना भी बहुत अच्छा सिद्ध हुआ है।यह तरीक़ा सरल और कम खर्चीला है इसलिए भेंट कलम लगाने के स्थान पर विनियर कलम को अपनाए जाने की सिफारिश की जाती है।

भेंट कलम लगाना

 इस तरीके में मूलवृन्त, रूट स्टाकद्ध वाले पौधे, वंशज, सायनद्ध पौधे के पास लाये जाते हैं । इस प्रक्रिया में मुल्वृन्त की छल 3-5 से.मी. की लम्बी तक छील ली जाती है । वंशज वृक्ष की भी इतने ही भाग की छाल छील ली जाती है । अब इन दोनों को छिली छाल वाले स्थान से जोड़कर एक साथ बाँध दिया जाता है । इसके लगभग 30 - 40 दिन बाद मूलवृन्त को कलम लगाये गए वंशज पौधे के ठीक ऊपर से काट देते हैं । लेकिन यह तरीका कठिन और खर्चीला है क्योंकि गमलों में लगाये गए मूल्वृन्तों को नियमित रूप से पानी देना पड़ता है । और उनकी देखभाल भी करनी पड़ती है ।

विनियर कलम लगना

यह तरीक़ा भेट कलम से भिन्न है।इस ढंग से मार्च से जुलाई कलम लगी जा सकती है।जो 80-90 प्रतिशत मामलों में सफल रहती है इस तरीके में वंशज तने गोल होने चाहिए और उनकी आयु लगभग 3-6 महीने ही होनी चाहिए सायनद्ध तैयार करने की अन्तिम शाखाओं को पत्तियों रहित कर दिया जाता है जिससे उसमें कलि निकल आती है इसके एक सप्ताह बाद सायनद्ध मूल पौधों को अलग करके बंधी मूलवृन्त के लिए किसी भी क़िस्म के 1-2 वर्ष वाले पौधे काम में लाये जा सकते हैं।दोनों पौधों को 5 से०मी० तिरछा काट कर 150 गेज वाली एक इंच चौड़ी अल्काथिन पट्टी लपेट दी जाती है।जब वंशज कलम से शाखाएँ फूटने लगती हैं तो मुल्वृन्त का उपरी भाग काट दिया जाता है।इस विधि से एक लाभ यह होता है की आप देश के किसी भी भाग या विदेश से कलम लाकर स्वयं कलम लगा सकते हैं।
यह तरीक़ा अपनाकर, घटिया क़िस्मों और पुराने पौधों को भी अच्छी क़िस्मों वाले आम के पौधों में बदला जा सकता है।इसलिए 5 से 10 साल पुराने पदों की शाखाओं को फ़रवरी के महीने में काट दिया जाता है और केवल कुछ शाखाएँ ही रहने दी जाती हैं।इसके बाद जब नई शाखाएँ निकालनी शुरू होती हैं तो जून-जुलाई के महीने में उन पर विनियर कलम लगा दी जातो है।इस प्रकार लगाये गए पौधों से 2 साल के अन्दर फल मिलने लगते हैं।
 

रोपाई

आम के पौधे रोपने के लिए सबसे पहले 8-12 मीटर की दुरी पर 1x1x1 मीटर आकर के गड्ढे खोद लिए जाते हैं।इन गड्ढों को जून के अंत में आधी मिट्टी और गोबर की खाद के मिश्रण से भर दिया जाता है।दीमक से बचाने के लिए प्रत्येक गड्ढे में 50 ग्राम क्लोरवीर  को दो लीटर पानी में घोलकर मिश्रण में मिला दिया जाता है।इसके बाद सिंचाई कर दी जाती है।आम की रोपाई का सबसे उपयुक्त समय बरसात का मौसम है लेकिन जिन क्षेत्रों में भरी वर्षा होती है वहां वर्षा समाप्त होने के बाद भी रोपाई की जा सकती है।

उर्वरकों का उपयोग

पुरी तरह विकसित और फल देने वाले आम के वृक्षों को नीचे लिखे पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है।

नाइट्रोजन : 725 ग्राम / पौधा

फ़ॉस्फ़रस : 180 ग्राम / पौधा

पोटाश : 680 ग्राम / पौधा

अमोनियम सल्फ़ेट, सुपर फ़ॉस्फ़ेट और म्यूरेट ऑफ़ पोटाश का 1:3:1 का मिश्रण तैयार कर लिया जाता है और पौधे की आयु के हिसाब से उसकी नीचे लिखी मात्राएँ प्रयोग की जाती है ।  इसके साथ ही प्रथम वर्ष में 15 किलो से 10 वर्ष की आयु पहुचने तक प्रति पौधा 100 किलो सड़ी गोबर की खाद अवशय दे ।

पौधे की आयु  उर्वरक- मिश्रण गोबर की खाद
1 साल 0.5 किलोग्राम +10 किलोग्राम
2 साल 1 किलोग्राम +20 किलोग्राम
3 साल 1 किलोग्राम +30 किलोग्राम
4 साल 1.5 किलोग्राम +30 किलोग्राम
5 साल 1.5 किलोग्राम +40 किलोग्राम
छठे से दसवें साल तक 2 - 2.5 किलोग्राम +40 किलोग्राम
ग्यारहवें से पंद्रहवें साल तक 3 - 5 किलोग्राम +60 किलोग्राम
पंद्रहवें साल के बाद 5 - 10 किलोग्राम +80 किलोग्राम

तीन साल तक की आयु वाले पौधों को खाद, दो खुराकों में क्रमशः मार्च और जून में देनी चाहिए । फल वाले वृक्षों में उर्वरकों के मिश्रण की आधी खुराक जुलाई के महीने में और शेष आधी खुराक अक्तूबर महीने में एक बार दी जानी चाहिए ।

सिंचाई

कम आयु वाले पौधों को गर्मियों के मौसम में हर सप्ताह और सर्दियों के मांह में एक बार सीचना चाहिए । जिन वृक्षों पर फल आ रहे हों उन्हें फल आने की अवस्था से लेकर फलों के पकने की अवस्था तक हर 10 दिन के बाद सींचना चाहिए । वर्षा के समय सिर्फ आवशकता अनुसार ही पानी दे ।

प्रमुख हानिकारक कीट

आम का टिड्डा

इस कीड़े के शिशु तथा प्रौढ़ आम की मंजरियों और उसके मुलायम तनों से कोशिका रस चूस लेते हैं । इसके परिणामस्वरूप आम की मंजरियाँ मुरझा कर भूरी हो जाती हैं और गिर जाती हैं एवं प्रभावित वृक्षों पर कम फल लगते हैं । जब इस कीड़े का आक्रमण गंभीर होता है तो तनों पर इसका प्रभाव अधिक पड़ता है और लगभग पूरा पेड़ काला पड़ जाता है ।

रोकथाम के उपाय

इस टिड्डे की रोकथाम के लिए जनवरी के महीने से हर 20 दिन के अन्तर पर वृक्षों पर 0.25 प्रतिशत कार्बोरिल या 0.1 प्रतिशत डायजिनान  या 0.1 प्रतिशत मिथाइल पाराथोन का छिड़काव करें।यह छिड़काव कम से कम दो बार अवश्य करें।

आम का धब्बेदार बग

 इस कीड़े के केवल शिशु और मादाएँ नुकसान पहुँचाते हैं।ये दोनों आम के पौधों का कोशिका रस चूस लेते हैं।इसके मुलायम तने और मंजरियाँ सूख जाती है तथा अधपके फल गिर जाते हैं।

रोकथाम के उपाय

पेड़ के आस-पास की मिट्टी की गुड़ाई करने से इस कीड़े के अंडे नष्ट हो जाते हैं।इसके अलावा पौधे के मुख्य तने के ज़मीन के पास वाले भाग पर 30 से०मी० चौड़ी अल्काथीन या प्लास्टिक की एक पट्टी लपेट देने से व उस पर कोई चिकना पदार्थ लगाने से इस कीड़े के शिशु पेड़ पर नहीं चढ़ पाते हैं यह काम दिसम्बर के महीने में कर देना चाहिए क्योंकि यही वह समय होता है जब कीड़े के अण्डों से बच्चे निकलने लगते हैं और फ़िर पेड़ पर चढ़ने लग जाते हैं। इसके साथ किसी भी उपयोक्त कीटनाशक का छिड़काव जनवरी एवं फ़रवरी माह में करे।

आम की गुठली का घुन

इस घुन की इल्ली आम की गुठली में छेड़ कर के घुस जाती है और उसके अन्दर अपना भोजन लेती रहती है । कुछ दिनों बाद ये गूदे में पहुँच जाती है और उसे नुकसान पहुंचती है ।

रोकथाम के उपाय : इस कीड़े को नियंत्रित करना बहुत कठिन होता है इसलिए जो भी फल पेड़ से गिरे उसे तथा पेड़ की सुखी पत्तियों और शाखाओं को इकट्ठा कर नष्ट कर देना चाहिए । इससे इस कीड़े की भी रोकथाम किसी सीमा तक हो जाती है ।

तना छेदक

इस कीड़े को तनों पर बुने हुए जालों में फंसे उनके मल की मौजूदगी से पहचाना जाता है ।

रोकथाम के उपाय : इस कीड़े की रोकथाम के लिए इसके द्वारा बनाये गए छेदों को किसी पतले तार से साफ़ कर उनमें 1 प्रतिशत वाले डायजिनान के साथ पेट्रोल डाल कर छेद को बंद कर देना चाहिए । तथा कमजोर मर रही टहनियों को पेड़ से अलग कर देना चाहिए ।

प्रमुख रोग

सफ़ेद चूर्णी रोग (पाउडरी मिल्ड्यू)

बौर आने की अवस्था में यदि मौसम बदली वाला हो या बरसात हो रही हो तो यह बीमारी प्रायः लग जाती है।इस बीमारी के प्रभाव से रोगग्रस्त भाग सफ़ेद दिखाई पड़ने लगता है।अंततः मंजरियाँ और फूल सूखकर गिर जाते हैं।इस बीमारी के लक्षण दिखाई देते ही आम के पेड़ों पर 5 प्रतिशत वाले गंधक के घोल का छिड़काव करने से इसकी रोकथाम में सहायता मिलती है।इसके अलावा 500 लीटर पानी में 250 ग्राम कैराथेन घोलकर छिड़काव करने से भी बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सकता है।जिन क्षेत्रों में बौर आने के समय मौसम असामान्य रहा हो वहां हर हालत में सुरक्षात्मक उपाय के आधार पर 0.2 प्रतिशत वाले गंधक के घोल का छिड़काव करे एवं आवशयकता अनुसार दुहराए।

कालवूणा (एन्थ्रेक्नोस)

यह बीमारी अधिक नमी वाले क्षेत्रों में ज्यादा पाई जाती है । इसका आक्रमण पौधों के पत्तों, शाखाओं, और फूलों जैसे मुलायम भागों पर अधिक होता है । प्रभावित हिस्सों में गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई पड़ने लगते हैं । इसकी रोकथाम 0.2 प्रतिशत जिनैब या 4:4:50 बोर्डो मिश्रण का छिड़काव करके की जा सकती है । जिन इलाकों में यह बीमारी अधिक फैलाती हो वहां सुरक्षा के तौर पर शुकियाँ विकसित होने से पहले ही उपरोक्त घोल का छिड़काव करना चाहिए ।

ब्लैक टिप रोग

यह बीमारी आम के उन बागों में पाई जाती है जो ईट के भट्ठों के पास होती हैं । इस बीमारी में सबसे पहले फल का अग्रभाग काला पड़ने लगता है इसके बाद उपरी हिस्सा पिला पड़ता है । फ़िर गहरा भूरा और अंत में काला हो जाता है । इस बीमारी से बचने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि ईट के भट्ठों की चिमनी आम के पुरे मौसम के दौरान लगभग 50 फुट ऊँची रखी जाए । इसके अलावा फलों के बढ़वार की विभिन्न अवस्थाओं के दौरान आम के पेडों पर 0.6 प्रतिशत बोरेक्स के दो छिड़काव फूल आने से पहले तथा तीसरा फूल बनने के बाद छिड़काव करना चाहिए ।

गुच्छा रोग ( माल्फार्मेसन)

इस बीमारी का मुख्य लक्षण यह है कि इसमें पूरा बौर नपुंसक फूलों का एक ठोस गुच्छा बन जाता है । बीमारी का नियंत्रण प्रभावित बौर और शाखाओं को तोड़कर किया जा सकता है । इसके अलावा अक्तूबर के महीने में 200 प्रति दस लक्षांश वाले नेप्थालिन एसिटिक एसिड का छिड़काव करना और कलियाँ आने कि अवस्था में जनवरी के महीने में पेड़ के बौर तोड़ देना भी लाभदायक रहता है क्योंकि इससे न केवल आम की उपज बढ़ जाती है अपितु इस बीमारी के आगे फैलने की संभावना भी कम हो जाती है ।

पत्तों का जलना

उत्तरी भारत में आम के कुछ बागों में पोटेशियम की कमी से एवं क्लोराइड की अधिकता से पत्तों के जलने की गंभीर समस्या है । इसमें पुराने पत्ते दूर से ही जले हुए जैसे दिखाई देते हैं । इस समस्या से बचने हेतु पौधों पर 5 प्रतिशत पोटेशियम सल्फ़ेट के छिड़काव की सिफारिश की जाती है । यह छिड़काव इसी समय करें जब पौधों पर नई पत्तियां आ रही हों । ऐसे बागों में पोटेशियम क्लोराइड उर्वरक प्रयोग न करने की सलाह भी दी जाती है । तथा ०.१ % मेलथिओन का छिड़काव करे।

फलों की तुड़ाई

फलों की तुड़ाई जून के आरम्भ से शुरू हो जाती है, मल्लिका जुलाई के तीसरे सप्ताह तक तैयार हो जाती है और आम्रपाली जुलाई के मध्य तक पकना आरम्भ कर देती है । आम्रपाली जिसमें हर साल फल आते हैं, सघन बाग़ अर्थात 1600 पौधे / हेक्टेअर 10 साल की अवस्था में 22 तन प्रति हेक्टेअर तक फल दे सकते हैं जो दशहरी की तुलना में 3 - 4 गुना अधिक है ।

कृषि विज्ञानं केन्द्र, ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया, राज. द्वारा.

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