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नींबू की उत्तम खेती
जलवायु एवं मिट्टी क़िस्में प्रवर्धन और मूलवृन्त
बाग़ की स्थापना बगीचे की देखभाल पौधों की छंटाई
पोषक तत्वों की कमी फलों का गिरना रोकथाम के उपाय
प्रमुख बीमारियाँ फलों की तुड़ाई

नींबू की प्रजाति

इस वर्ग में मौसम्बी , संतरा, मिट्ठा, कागजी नींबू और चकोतर जैसे फल आते हैं। इनकी बागवानी से सम्बंधित विभिन्न पहलुओं का वर्णन निचे किया गया है।

जलवायु एवं मिट्टी

नींबू जाति के फलों के लिए दोमट और बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त रहती है। इन फलों के लिए 6 - 6.5 पी.एच. वाली मिट्टी सबसे अच्छी रहती है। लवणीय या क्षारीय मिट्टियाँ तथा एसे क्षेत्र जहाँ पानी ठहर जाता हो, नींबू जाति के फलों के लिए उपयुक्त नहीं माने जाते। यह अवश्यक है की बाग़ लगाने से पहले मृदा जाँच अवश्य कराये ।

मौसम्बी और चकोतरा

उष्ण कटिबंधीय और सुखी जलवायु में अच्छी उपज देते हैं। मौसम्बी को यदि वर्षा और अधिक नमी वाले क्षेत्रों में उगाया जाता है तो उसके फल भली प्रकार नहीं पकते, जिसके परिणाम स्वरूप वे फीके रह जाते हैं और उनका छिलका भी हरा ही बना रहता है।
संतरे के लिए उष्ण कटिबंधीय और नमीयुक्त गर्मी का मौसम उपयुक्त है इसके साथ-साथ सर्दी बहुत कम होनी चाहिए और वर्षा काफ़ी होनी चाहिए। बहुत अधिक ठंडा और अधिक गर्म मौसम इसकी फ़सल के लिए उपयुक्त नहीं है। नींबू के लिए हलकी नमी से युक्त और तेज़ हवा से रहित परिस्थितियाँ सबसे उपयुक्त है। यह पाले के लिए भी संवेदनशील है।

क़िस्में 


वर्ग क़िस्में
मौसम्बी / मिट्ठा मौसम्बी और माल्टा
चकोतरा डंकन, फोस्टर, थाम्पसन, मार्श
संतरा किन्नो, नागपुर, कुर्ग
नींबू कागज़ी कलां, बारामासी, मीठा निम्बू


प्रवर्धन और मूलवृन्त

मूलवृन्त उगने के लिए फल से निकले हुए ताजे बीज अगस्त-सितम्बर के महीने में बोने चाहिए। यदि बुआई में देरी हो जाये तो ठण्ड के कारण अंकुरण अच्छा नहीं होता है। इन फलों के प्रवर्धन के लिए 'टी' कलिकायन का तरीक़ा सबसे अच्छा है। इसके लिए सितम्बर-अक्तूबर के महीने अति उत्तम पाए गए हैं। हालाँकि स्थान विशेष के लिए तरह-तरह के मुल्वृन्तों का मानकीकरण हुआ है। परन्तु उत्तर भारत में 'जंभीरी' और 'कर्णा खट्टा' उत्तम पाए गए हैं। यदि मिट्टी हल्की लवणीय हो तो संतरे के लिए किल्योपेट्रा क़िस्म का मूलवृन्त अधिक उपयुक्त रहता है।

बाग़ की स्थापन

बाग़ लगाने के लिए उचित दुरी पर 3 x 3 x 3 फीट आकर के गड्ढे खोद लिए जाते हैं। साधारणतः मौसम्बी संतरे के पौधे 5 x 4 मी. चकोतरे के 7 या 8 मी. एवं नींबू के 4-5 मी. दुरी पर लगाये जाते हैं। इन गड्ढों को मिट्टी के साथ 20-25 कि०ग्रा० गोबर की खाद मिलकर भर दिया जाता है। दीमक के प्रकोप से बचने हेतु प्रत्येक गड्ढे में 200 ग्राम क्लोरवीर की धुल डालें।

जो पौधे कलिकायन द्वारा तैयार किये जाते हैं वे लगभग एक साल में रोपाई योग्य हो जाते हैं, पौधे लगाने के लिए बरसात का मौसम अति उत्तम है। परन्तु मार्च एवं अप्रेल में भी पौधे सफलतापूर्वक लगाये जा सकते हैं।

पौधे लगाने से पहले प्रत्येक गड्ढे की मिट्टी में 20 कि०ग्रा० या एक टोकरी गोबर अथवा कम्पोस्ट खाद और एक किलो सुपर फ़ॉस्फ़ेट मिलाना लें अच्छा रहता है। रोपाई के बाद नीचे लिखे अनुसार उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए।
 

वृक्ष की आयु मात्रा किलोग्राम प्रति वृक्ष
  गोबर की खाद (कि. ग्रा.) अमोनियम सल्फ़ेट सुपर फास्फेट म्यूरेट ऑफ़ पोटाश
1 20 1/4 1/4 1/4
2 25 1/2 1/4 1/2
3 30 1 1/2 1/2
4 40 3/2 1 3/4
5 50 2 2 1

पूरी तरह विकसित और फल देने वाले वृक्षों के लिए प्रति पेड़़ 60 किग्रा गोबर की खाद, 2.5 किग्रा. अमोनियम सल्फ़ेट, 2.5 किग्रा. सुपर फास्फेट और 1.5 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ़ पोटाश का प्रयोग करना चाहिए। उर्वरकों की उपरोक्त मात्र का उपयोग दो बराबर खुराकों में करें। पहली खुराक जनवरी से पहले दें, और दूसरी फल आने के बाद। दोनों बार उर्वरक देने के बाद सिंचाई करें। गोबर की खाद नवम्बर - दिसम्बर के महीनों में डालनी चाहिए।

बगीचे की देखभाल

सिंचाई

रोपाई के तुंरत बाद बाग़ की सिंचाई करें। छोटे पौधों 5 साल तक के पौधों की सिंचाई उनके आस-पास घेरा बनाकर की जा सकती है। जब कि पुराने पौधों के आस-पास पानी भरकर या नालियाँ बनाकर सिंचाई की जाती है। गर्मियों के मौसम में हर 10 या 15 दिन के अंतर पर और सर्दियों के मौसम में प्रति 4 सप्ताह बाद सिंचाई करनी चाहिए। बरसात के मौसम में सिंचाई की यदाकदा ही आवश्यकता होती है। इस मौसम में बरसात का अतिरिक्त पानी निकालने की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए। सिंचाई करते समय ध्यान रखें कि सिंचाई का पानी पेड़ के मुख्य तने के संपर्क में न आए। इसके लिए मुख्य तने के आसपास मिट्टी की एक छोटी मंद बनायीं जा सकती है। ड्रिप सिचाई विधि सबसे अच्छी रहती है. इसके द्वारा पानी की बचत उर्वरको का उपयोग होता है, साथ बीमारिया कम आती है।

निराई - गुड़ाई

नींबू जाति के फलों वाले बागों को कभी भी गहरा नहीं जोता जान चाहिए। क्योंकि इन पेड़ों की जड़ें ज़मीन की उपरी सतह में रहती हैं और गहरी जुताई करने से उनके नष्ट होने का खतरा रहता है। बागों में खरपतवारों की रोकथाम की जाए तो ज्यादा अच्छा है। प्रति हेक्टेअर 7.5-10 किलो तक सिमेंजिन या 2.5 लीटर ग्रेमेक्सोन को 500 लीटर पानी में घोल कर छिड़कने से चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार तथा वार्षिक घासें नष्ट की जा सकती हैं।

पौधों की छंटाई

पौधों का अच्छा विकास हो इसके लिए उनकी छंटाई क्यारियों की अवस्था से ही शुरू हो जाती है। पौधे की लगभग सभी उपरी और बाहर निकलने वाली शाखाओं को काट दिया जाना चाहिए और इस प्रकार लगभग 45 से०मी० लम्बाई का साफ़ और सीधा तना ही रहने दिया जाना चाहिए। समय पर सभी रोग-ग्रस्त, टूटी हुई अनेकों शाखाओं वाली और सुखी लकडी वाली टहनियों को निकलते रहना चाहिए। जिस जगह पर कलि जोड़ी है उसके ठीक नीचे से निकलने वाली प्ररोहों को उनकी आरंभिक अवस्था में ही हवा देना चाहिए। जिन स्थानों पर शाखाएँ काटी गयी हों, वहां पर बोरोदोक्स नामक रसायन की लेई बना कर लगा दें। यह लेई एक कि०ग्रा० कॉपर सल्फ़ेट, 1.5 कि०ग्रा० बुझा चुना, और 1.5 लीटर पानी को मिलकर तैयार की जा सकती है।

पोषक तत्वों की कमी और टहनियों का सूखना

नींबू जाति के फलों में नई और पुरानी पत्तियाँ क्लोरोसिस की शिकार हो जाती हैं। ऐसे मामले में पत्तियों का आकर छोटा हो जाता है और टहनियाँ मुरझाने लगती हैं। ऐसा जस्ते, जिंक, मैगनीज, ताम्बे और लोहा तत्त्व जैसे सुक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के कारण होता है। इसके लिए निम्नलिखित रसायनों का छिड़काव किया जाता है। सबसे अधिक प्रभाव प्राप्त करने के लिए यह छिड़काव तब करना चाहिए जब पदों में नई पत्तियाँ काफ़ी संख्या में निकल रही हों। छिड़के जाने वाले रसायनों और उनकी मात्रा का विवरण नीचे दिया गया है :- 

रसायन मात्रा (प्रति है.)
जिंक सल्फ़ेट 2.5 किलोग्राम
कॉपर सल्फ़ेट 1.5 किलोग्राम
मैग्नीशियम सल्फ़ेट 1 किलोग्राम
फेरस सल्फ़ेट 1 किलोग्राम
बोरोन 500 ग्राम
चूना ( बुझा हुआ ) 4.5 किलोग्राम
यूरिया 5 किलोग्राम
पानी 450 लीटर


फलों का गिरन

खासतौर से संतरों, मिट्ठों और मौसम्बी में पकने से पहले ही फलों का गिरना एक आम समस्या है। इसे कम करने के लिए पौधों पर 10 प्रति दस लाक्षांश वाले 2-4 डी (बागवानी ग्रेड) घोल का छिड़काव करना चाहिए। उपरोक्त घोल 100 लीटर पानी में एक ग्राम रसायन मिलाकर तैयार किया जाता है।

अन्तः फसलें
यदि नींबू जाती के फलों वाले बाग़ में कोई अन्तः फ़सल उगानी हो तो सर्दियों के मौसम में ऐसी फ़सल नहीं उगानी चाहिए जिसे अधिक सिंचाई की आवश्यकता हो। यदि सिंचाई की पर्याप्त सुविधा हो तो इन फलों के बागों में सेम और लोबिया की फ़सल गर्मियों के मौसम में उगाना लाभदायक होता है। इसके अलावा बरसात के मौसम में सनी और ग्वार जैसे हरी खाद वाली फ़सल उगने से खरपतवारों की भी रोकथाम हो जाती है और भारी वर्षा का अतिरिक्त पानी भी इन फसलों द्वारा इस्तेमाल कर लिया जाता है। लेकिन वैज्ञानिक तौर पर इस प्रजाति के बागों में अन्तः फसलें उगाना सही नहीं पाया गया है।

रोकथाम के उपाय

आरंभिक अवस्था में इन कीड़ों को हाथ से पकड़ कर नष्ट कर देना चाहिए और गंभीर आक्रमण की अवस्था में रोगोर 2 मि०ली० या 2 मि०ली० मिथाइल पाराथोन  प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से इस कीड़े की रोकथाम की जा सकती है।

नींबू वाली सिल्ला
यह कीड़ा जब छोटा होता है तो पदों की पत्तियों और टहनियों से कोशिका रस चूस लेता है। इसके अलावा इसके शिशु एक शहद जैसा पदार्थ छोड़ते हैं जिन पर काली फफूंद लग जाती है और पत्तियों तथा टहनियों पर फ़ैलजाती है। इससे पौधे अपना भोजन नहीं बना पाते हैं। सिल्ले द्वारा कोशिका रस चूस लिए जाने के कारण पत्तियां, कलियाँ और फुल मुरझा जाते हैं। इसके साथ यह कीड़ा एक किस्म के विषाणुओं को भी फैलता है। जिससे नींबू की पैदावार कम होती है।

रोकथाम के उपाय
 इस कीड़े की रोकथाम फास्फोमिडान 3 मिली या 15 मि०ली० मिथाइल पाराथोन  के 10 लीटर पानी में बने घोल का छिड़काव करके की जा सकती है।

नींबू वाली सफ़ेद मक्खी
इस कीड़े के शिशु भी प्रौढ़ पत्तियों से कोशिका रस चूस लेते हैं। जिससे परिणामस्वरूप पत्तियाँ मुड़ जाती हैं और गिर जाती हैं। इसके अलावा इस कीड़े द्वारा निकाले गए शहद जैसे पदार्थ पर काली फफूंद लग जाने से पौधों की भोजन बनाने की क्षमता भी कम हो जाती है। इसकी रोकथाम 3 मि०ली० फास्फोमिडान, 15 मि०ली० मिथाइल डेमेटान, 15 मि०ली० डाईमैथेएट या 15 मिली मिथाइल पाराथोन  के 10 लीटर पानी में बने घोल का छिड़काव करके की जा सकती है।

लीफ माइनर
इस कीड़े की इल्ली तने में छेद करती है और छिलका खा कर पेड़ों को हानि पहुँचती है। इसके नियंत्रण के लिए रुई को पेट्रल, फॉर्मलिन या कार्बन सल्फ़ाइड में भिगो कर छेद के अन्दर ठूंस देना चाहिए। फिर चिकनी मिट्टी के लेप से छेद को बंद कर देना चाहिए। जब पेड़ों में नए फुटाव हो रहे हों तो फास्फोमिडान 3 मि०ली० या मिथाइडेमेंटोन 15 मि०ली० का 15 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। वर्षा ऋतू में नीम की खली के घोल 1 कि०ग्रा० का 10-20 लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिन के अंतर पर छिड़काव करें।

तना बेधक कीड़ा
इस कीड़े की इल्ली तने में छेद करती है और छिलका खा कर पेड़ों को हानि पहुँचाती है। इसके नियंत्रण के लिए रुई को पेट्रल, फॉर्मलिन या कार्बन सल्फ़ाइड में भिगो कर छेद के अन्दर ठूंस देना चाहिए। फिर चिकनी मिट्टी के लेप से छेद को बंद कर देना चाहिए।

प्रमुख बीमारियाँ

नींबू का नासूर (केंकर रोग)
बरसात के मौसम में कागजी नींबू में यह बीमारी आमतौर पर लग जाती है और पत्तियों, टहनियों, काँटों और फलों को प्रभावित करती है। इस बीमारी के लक्षण के तौर पर सबसे पहले पौधों के उपयुक्त भागों में छोटे-छोटे हलके पीले रंग के धब्बे पद जाते हैं जो बाद में 3 या 4 मिलीमीटर ब्यास के हो जाते हैं अंततः ये धब्बे उठे हुए और खुरदरे हो जाते हैं तथा भूरे हो जाते हैं। इस बीमारी की रोकथाम मुख्यतः प्रभावित शाखाओं को हटाकर या बोर्दोक्स के 5:5:50 के मिश्रण का छिड़काव करके ही की जा सकती है। इसके अलावा स्ट्रेप्टोसाइक्लिन नमक रसायन की 1 ग्राम मात्र नीम की खली के साथ 20 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव से भी इस बीमारी से छुटकारा पाया जा सकता है।

फलों की तुड़ाई

नींबू को अगस्त - सितम्बर के महीने में तथा किन्नो, संतरे और चकोतरे को दिसम्बर के महीने में तोड़ा जाता है। फलों को तोड़ते समय इस बात की विशेष सावधानी बरतनी चाहिए कि फलों के साथ - साथ थोड़ा हिस्सा तनों और पत्तियों का भी तोड़ लिया जाए ताकि फल के छिलके को कोई नुकसान न हो।

कृषि विज्ञानं केन्द्र, ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया, राज. द्वारा.

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