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 बेर हमारे लिए एक बहुपयोगी एवं पोषक फल है । इसमें विटामिन 'सी' तथा 'ए' प्रचुर मात्र में होते हैं । विटामिनों के अलावा बेर में कैल्शियम, फ़ॉस्फ़रस तथा आयरन आदि खनिज लवण भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं । मौसमी फलों में सभी वर्गों में यह बहुत लोकप्रिय है । पोषकता के आधार पर इसे सेव फल के अनुरूप ही पाया जाता है ।

भूमि तथा जलवायु

बेर का वृक्ष उन ख़राब तथा कम उपजाऊ भूमि में भी पैदा हो जाता है, जहाँ पर अन्य फल वृक्ष नहीं उग पाती हैं । अच्छी फ़सल के लिए उदासीन या थोडी क्षारीय गहरी दोमट भूमि सर्वोत्तम रहती है । मार्च - अप्रेल में फल देने के बाद बेर पत्तियां गिरा देता है । तथा नई पत्तिया जून तक नहीं आती हैं, इस कारण से यह सूखे को सहन कर लेता है । अतः इन्हे शुष्क और अर्ध - शुष्क जलवायु वाले भागों में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है ।

क़िस्में


देश के विभिन्न भागों में इसकी बहुत सी प्रजातियाँ उगाई जाती हैं ।
उत्तर प्रदेश बनारसी कडाका, बनारसी, पैवन्दी, नरमा, अलीगंज
बिहार बनारसी, नागपुरी, पैवन्दी, थोर्नलैस
महाराष्ट्र कोथो, महरूम, उमरान
आन्ध्र प्रदेश बनारसी, दोढया, उमरान
पंजाब, हरियाणा उमरान, कैथली, गोला, सफेदा, सौनोर - २, पौंडा
राजस्थान सौनोर, थोर्नलैस
दिल्ली गोला, मुड़या महरेश, उमरान, पोंडा

उमरान के फल तोड़ने के बाद जल्दी ख़राब नहीं होते हैं । तथा यह एक अच्छी कीमत पर बिकता है । गोला, मुड़या , तथा महारा जल्दी पकने वाली जातियाँ हैं तथा बाजार में अच्छी कीमत देती हैं ।

प्रवर्धन

बेर का प्रवर्धन मुख्य रूप से कलिकायन द्वारा किया जाता है। इसके मूलकृत तैयार किये जाते हैं। जो पूरी तरह पके हुए फलों से बीज लेकर तैयार किये जाते हैं। मार्च-अप्रेल के महीने में पूरी तरह पके फलों से बीज लेकर क्यारियों में बो दिए जाते हैं। ये बीज 3-4 सप्ताह बाद उग जाते हैं तथा जुलाई से सितम्बर के बीच उचित आकर के हो जाने पर इनमें कलिकायन किया जाता है। कलिका अच्छी फ़सल देने वाली इच्छित क़िस्म के पौध से ली जाती है। कलिकायन के लिए वलय (रिंग) तथा शील्ड विधि प्रवर्धन के लिए उपयोगी पाए गए हैं। कलिका ऐसी शाखा से ली जाये जो स्वस्थ हो।

पौध रोपण

बेर की रोपाई अगस्त से सितम्बर महीने में की जाती है इसके लिए 9 x 9 की दुरी पर गड्ढे तैयार कर लिए जाते हैं। गड्ढों को आधा मिट्टी तथा आधा गोबर की खाद मिला कर भर लें। नर्सरी से पौधे को उखाड़ते समय यह ध्यान रखें कि इसके साथ कम से कम 30 से०मी० मिट्टी उठाई जाये। ऐसा करने से जड़ें कम क्षतिग्रस्त होती हैं तथा रोपड़ के बाद पौधों को लगने में मदद होती है।
पौधे को लगाने के तुंरत बाद सिंचाई करनी चाहिए। इसके बाद पौधे को पूर्णतः स्थापित होने तक प्रतेक सप्ताह सिंचाई की आवश्यकता होती है।शुक्ष्मकाल में मार्च से जून तक किसी प्रकार की सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। पौधों को फलों के विकास के समय अक्तूबर से फ़रवरी महीने में एक बार सिंचाई अवश्य करनी चाहिए।
 

खाद एवं उर्वरक

एक वर्ष के पौधे को 10 कि०ग्रा० गोबर की खाद, 50-60 ग्राम नाइट्रोजन तथा 25-30 ग्राम फ़ॉस्फ़रस की आवश्यकता होती है। दो वर्ष के पौधे को 15 कि०ग्रा० गोबर की खाद, 100 ग्राम नाइट्रोजन, 50 ग्राम फ़ॉस्फ़रस तथा 200 ग्राम पोटाश देनी चाहिए। तीन वर्ष के पौधे को 20 किग्रा गोबर की खाद, 400-500 ग्राम नाइट्रोजन, 100 ग्राम फ़ॉस्फ़रस तथा 200 ग्राम पोटाश की जरुरत होती है। 4 वर्ष के पौधे तथा सभी फल देने वाले पौधों को प्रतिवर्ष 25 कि०ग्रा०गोबर की खाद, 600-800 ग्राम नाइट्रोजन, 150 ग्राम फ़ॉस्फ़रस तथा 300 ग्राम पोटाश देना चाहिए। गोबर की खाद खाद जून के अंत या जुलाई के प्रथम सप्ताह तथा उर्वरको को जुलाई के अंतिम सप्ताह में दे ।

टोनिंग

सुदृढ़ ढांचे के लिए टोनिंग आवश्यक है । मुख्य तने को 90 से०मी० तक बिना शाखाओ के बढ़ने देते हैं । इसके बाद तीन चार शाखाओं को छांटकर उन्हें आगे बढ़ने देते हैं ।

काट - छाँट : बेर का बौर नई शाखा के कलिका में ही आता है । अतः अच्छी फ़सल के लिए प्रत्येक वर्ष नई शाखाओं की आवश्यकता होती है । इसके लिए एक वर्ष पुरानी शाखा का 25 - 50 प्रतिशत उपरी भाग काट देना चाहिए । उत्तरी भारत में काट-छाँट का उचित समय मध्य मई से मध्य जून तक है ।

फलों का तोड़ना

बेर का वृक्ष 2 - 3 वर्ष का होने पर फल देना शुरू कर देता है । उत्तरी भारत में फल के पकने का समय मध्य फ़रवरी से मध्य अप्रेल तक का होता है । फल जब सुनहरे पीले रंग के हो जाये तब ही तोड़ना चाहिए क्योंकि तोड़ने के बाद कच्चा फल ठीक से पकता नहीं है ।

कीट एवं रोग संरक्षण

बेर में लगने वाले मुख्य कीट फल बेधक एवं फल मक्खी है। फल बेधक की रोकथाम के लिए जनवरी से 3 मि०ली० क्लोरवीर प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें। छिड़काव के एक सप्ताह तक फल नहीं तोड़ने चाहिए। फल मक्खी के लिए मिथाइल पाराथोन  2 मि०ली० प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिन के अंतर से जनवरी से मार्च के बीच छिड़काव करना चाहिए। बेर में मुख्य रोग चुर्णित आसिता लगता है। इस रोग में पौधा पत्तियाँ गिरा देता है। यदि फल रहते भी हैं तो उनका आकर छोटा हो जाता है, इसकी रोकथाम के लिए जुलाई, सितम्बर, नवम्बर या दिसम्बर माह में कैराथेन 5 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करे और इसे दोबारा दोहराए । दीमक की रोकथाम के लिए ५० मीली क्लोरवीर ५० लीटर पानी में घोल कर प्रति पौधा दे ।

पैदावार

9 से 10 वर्ष आयु वाले बेर की कलमी पौधे से 15 - 25 किलोग्राम प्रति पौधा फल मिल सकता है ।

कृषि विज्ञानं केन्द्र, ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया, राज. द्वारा.

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