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आँवला की उत्तम खेती
 
 
मिट्टी की जलवायु क़िस्में प्रवर्धन
  प्रमुख कीट एवं व्याधियां  

आँवला शुष्क क्षेत्र में उगाया जाने वाल एक महत्वपूर्ण फल वृक्ष है। आँवला व्यवसायिक दृष्टि से एवं औषधीय दृष्टि से काफ़ी महत्वपूर्ण है। आँवला एक बहुत पौष्टिक फल है। इसमें विटामिन सी की मात्र 400-600 मिली ग्राम / 100 ग्राम व कुल घुलनशील तत्त्व, मिठास 10-15 प्रतिशत होती है। इसके अलावा इस फल में खनिज पदार्थ, वसा, रेशा, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन आदि भी प्रचुर मात्र में पाए जाते हैं। आंवले का उपयोग अधिकतर मुरब्बा, अचार, जैली, एवं चटनी के रूप में किया जाता है। इसके फल का स्वाद अम्लीय तथा कसैलापन लिए होता है। औषधि के क्षेत्र में भी यह फल अपना विशेष महत्व रखता है। यूनानी तथा आयुर्वेद दवाओं में इसका प्रयोग किया जाता है। सबसे पहले तो 'त्रिफला' नामक पाचन शक्तिवर्धक चूर्ण का यह महत्वपूर्ण अंग है। इसके अतिरिक्त फल या पौधे के दुसरे भाग भी कई बिमारियों के इलाज में काम आते हैं। जैसे- पेचिश, मूत्र सम्बन्धी रोग, गले के रोग, काफ, हैजा, तथा पोलियो। आँवला फ़सल की बागवानी हेतु कुछ जानकारी नीचे दी गई है।

जलवायु एवं मिट्टी

आंवले की खेती शुष्क क्षेत्रों में आसानी से की जा सकती है । यह उष्ण तथा उपोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु में सफलता पूर्वक उगाया जा सकता है । शुरुआत के 2 - 3 वर्षों तक पौधों को लू एवं पाले से बचाना अति आवश्यक है । बाद में विशेष प्रभाव नही पड़ता है , आंवले की अच्छी खेती के लिए हलकी या भरी मिट्टी या पानी के निकास वाली दोमट मिट्टी बहुत बढ़िया होती है । यह सुखी एवं क्षारीय मिट्टी में भी उगाया जाता है । इसके लिए 2 मीटर गहरी भूमि की आवश्यकता होती है ।

क़िस्में

  1. बनारसी : इसके फल बड़े आकर के, औसत साइज 5 से०मी०, अचार बनाने के लिए उपयुक्त है ।

  2. चकैया : फल बड़े आकर के, औसत साइज 3 - 4 से०मी०, अचार बनाने के उपयुक्त, विटामिन सी की मात्रा सर्वाधिक ।

  3. हाथीझूल (फ्रांसिस) : फल बड़े आकर के बीच में थोड़े दबे हुए, हरे रंग के 6 धारियों वाले, मुरब्बा के लिए उपयुक्त ।

  4. एन.ए. -7 :  इसके फल बड़े आकर के, औसत वजन प्रति फल 40 - 50 ग्राम ।

  5. कृष्णा :  इसके फल मध्यम आकर के 6 - 8 धारियों वाले, फलों में रेशे कम तथा फल पारदर्शी होते हैं ।

प्रवर्धन ( कलम लगाना)

आंवले का प्रवर्धन बीज तथा वानस्पतिक दोनों विधियों द्वारा किया जाता है। मूलवृन्त के लिए बीज पौधा 3-4 माह पुराना होना चाहिए। इसका प्रवर्धन कलम द्वारा भी सफलता पूर्वक किया जाता है। आंवले के पुराने वृक्षों पर शिखर रोपण भी किया जा सकता है। इससे निकले हुए नए प्ररोहों पर शील्ड कलिकायन द्वारा अच्छी कलिका लगा दी जाती है। इससे निम्न कोटि के बीज पेड़ उच्च कोटि में परिवर्तित किए जा सकते हैं।

पौधे लगाना

पौधे लगाने से पहले गहरी जुताई करके खेत को समतल करें। इसके पौधों को 8 x 8 मीटर की दुरी पर जून-जुलाई के महीने में पहले से तैयार किए गए गड्ढों में लगाया जाता है। पौधे लगाने के लिए 1 x 1 x 1 मीटर आकर के गड्ढे खोदे जाते हैं। इन गड्ढों में 10-15 कि०ग्रा० गोबर की सडी खाद तथा 50-100 ग्राम क्यूनालफास 1.5 प्रतिशत चूर्ण प्रति गड्ढे के हिसाब से मिलाकर गड्ढों में भर देते हैं।

अन्य कृषि क्रियाएँ : काफ़ी देखभाल के बावजूद भी पेड़ लगाने के बाद इसके पत्ते झाड़ जाते हैं। परन्तु थोड़े समय बाद ही फ़िर लग आते हैं। इसके पौधों को वर्षा एवं सर्द ऋतू में सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है। मार्च के महीने में जब कपोले निकलने लगें तो सिंचाई करना प्रारम्भ कर देते हैं। जून माह में 15 दिन के अन्तर पर सिंचाई करनी चाहिए। पौधे को 15 कि०ग्रा० गोबर की खाद प्रति वर्ष पौधे की आयुनुसार दें तथा फ़रवरी में 1 कि.ग्रा. किसान खाद और 1.5 किग्रा सुपर फ़ॉस्फ़ेट प्रति पौधा तथा जुलाई में 1 कि०ग्रा० किसान खाद दूसरी बार डालें। इसके अलावा 30 ग्राम नाइट्रोजन प्रतिवाढ़स उम्र के हिसाब से प्रति पेड़ 10 वर्ष तक डाले व 10 वर्ष की आयु के बाद 700-900 ग्राम नाइट्रोजन प्रति वर्ष प्रति पेड़ डालें।

फलन :- वानस्पतिक विधि द्वारा तैयार किया गया पौधा 4-5 वर्ष कि आयु में फल देना प्रारम्भ कर देता है। फूल मार्च-अप्रेल में आते हैं, तथा नवम्बर-दिसम्बर में फल पाक जाते हैं। इसकी फ़सल फ़रवरी माह में लेनी चाहिए। क्योंकि इस समय फलों में विटामिन सी की मात्रा सर्वाधिक होती है। एक पेड़ से लगभग 1.5-2 क्विंटल पैदावार हो जाती है।

प्रमुख कीट एवं व्याधियां

1. छाल खाने वाली सुण्डी

यह तने में सुरंग बनाती है और छल को खाती है । रोकथाम के उपाय: सूखी शाखाओं को काटकर जला दें तथा बाग़ को साफ़ सुथरा रखें। सितम्बर-अक्तूबर में क्लोरवीर 35 ई.सी. 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोलकर सुराखों के चारों ओर लगाये तथा फ़रवरी-मार्च में किसी पिचकारी की सहायता से 3-5 मि.ली. प्रति सुरंग डालें तथा सुराख़ को गीली मिट्टी से बंद कर दें।

2. आंवले का रोली रोग (रस्ट)

इसके प्रकोप से पत्तियों पर रोली के धब्बे बन जाते हैं। तथा कभी-कभी पूरे फल पर फ़ैल जाते हैं। रोगी फल पकने से पहले ही झड़ जाते हैं। रोकथाम के उपाय : इस कीड़े को नियंत्रित करना बहुत ही कठिन है। इसलिए जो भी फल पेड़ से गिर जाए उसे तथा पेड़ की सूखी पत्तियों और शाखाओं को इकट्ठा करके नष्ट कर देना चाहिए। इससे इस कीड़े की भी रोकथाम किसी सीमा तक हो जाती है। 

कृषि विज्ञानं केन्द्र, ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया, राज. द्वारा.

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