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माह - फरवरी

 

गेहूँ जौ चना सरसों सूरजमुखी मटर
 

गेहूँ

समय पर बोए गेहूँ (नवम्बर मध्य) में बालियाँ आने का समय होगा अतः इस समय सिंचाई का विशेष ध्यान रखा जावे। इसी प्रकार देरी से बोऐ गये गेहूँ (मध्य दिसम्बर तक) में गॉंठ बनने की अवस्था होगी। इस अवस्था पर भी सिंचाई का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिये। अत्याधिक देरी से बोए गये गेहूँ (31 दिसम्बर से जनवरी का प्रथम सप्ताह तक) में फुटाव की अवस्था होगी, यह भी सिंचाई के लिये क्रान्तिक अवस्था होगी।

जौ

फूल आते समय व दाने की दूधिया अवस्था पर नमी की कमी नहीं होनी चाहिये, अतः आवश्याकतानुसार सिंचाई का विशेष ध्यान रखें। जंगली जई व गुली डंडा (गेहूँ-सा खरपतवार) पहचानने योग्य हो जाने पर खड़ी फ़सल में से उखाड़ कर पशुओं का चारे के रूप में खिलाएँ।

चना

असिंचित क्षेत्रों में चने की कटाई फरवरी के अन्त में होने लग जाती है। सिंचित क्षेत्र मे भी अगेती किस्में जैसे कि दाहोद पीला यदि अक्टूबर माह में बोया गया हो तो कटाई के लिये तैयार होने की स्थिति मे होगा, अतः समय पर कटाई करें। कभी-कभी फरवरी माह में पाला पड़ने की संभावना रहती है, अतः पाले से बचाव करें। इसके लिये खेत के चारों ओर धुंआ करें।

सरसों

असिंचित क्षेत्रों में सरसों की कटाई का समय है अतः फ़सल को समय पर काट लें तथा खलिहान में पेन्टेड बग से बचाव हेतु भूमि पर 2% पेराथियान पाउडर का भुरकाव कर दें। सिंचित फ़सल में उत्तरी क्षेत्र में 90 से 100 दिन की अवस्था पर सिंचाई करना लाभदायक पाया गया है।

सूरजमुखी

संकर या अधिक उपज देने वाली किस्में 90 से 110 दिन में पकती हैं। यदि बुवाई अक्टूबर-नवम्बर में की गई हो तो फ़सल पकने की स्थिति में होगी देरी से बोई गई फ़सल में सिंचाई अवश्य करें।

मटर

देरी से बोई गई मटर की फ़सल में फली आनें पर सिंचाई करें। अगेती फ़सल पकने की अवस्था में होगी, अतः समय पर कटाई करें।


 

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