कृषि समस्याएं और सुझाव

प्रस्तुत प्रश्नोत्तरी किसानो द्वारा पूछे गये प्रश्नों एवं विशेषज्ञों द्वारा दिये गये उत्तरों पर आधारित एक उपयोगी संकलन है । इस प्रश्नोत्तरी में दी गई जानकारी , कृषि एवं कृषि आधारित समस्याओं का समाधान करने में कारगर साबित हो सकती है ।

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पशुपालन

 11. 

 प्रश्न : पशुओं में गलघोटू रोग के लक्षण, बचाव व रोकथाम के बारे में बतायें।

उत्तर :मुख्यतः गाय, भैंस प्रजाति के पशुओं का रोग है जो जीवाणुओं द्वारा फैलता है। दो वर्ष से कम आयु के पशुओं (बछड़ा/बछडी या कटडा/कटडी) में रोग से अचानक मृत्यु हो जाती है। गाय की अपेक्षा भैंसों में इस रोग का 3 गुणा अधिक प्रभाव होता है। सांस लेने में कठिनाई के कारण मृत्यु हो जाती है। भेड़ और बकरियों में भी यह रोग हो सकता है। मृत्यु दर अधिक होने और तेजी से बीमारी फैलने के कारण पशुपालकों को भारी नुक़सान होता है।
लक्षण : बुखार, सांस लेने में कठिनाई, सांस लेते समय गले से आवाज आना, गले और झालर क्षेत्र में सूजन, सुस्ती, चारा खाने में अरुचि, मुँह से लार टपकना।
रोकथाम :
1. बीमार पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग करें। उनके चारे-पानी की व्यवस्था अलग करें। यदि संभव हो तो अलग-अलग आदमी बीमार और स्वस्थ पशुओं को देखरेख करें। इकट्‌ठे रहने से सांस द्वारा, पानी-पीने और चारा एक साथ चरने से रोग शीघ्र फैल सकता है। बीमार पशु को जोहड़ में पानी न पिलाएँ अन्यथा गाँव के पशुओं में रोग तुरंत फैल सकता है।
2. बछडा/बछडी, कटडा/कटडी को बीमार पशु का दूध पिलाने से उनमें बीमारी हो सकती है। अतः उन्हें अलग करें। छोटे पशुओं में बीमारी से लड़ने की ताकत (रोग प्रतिरोध क्षमता) कम होती है। इसलिए अचानक उनमें मृत्यु हो जाती है।
3. बीमारी के विषय में तथा मृत पशुओं के शव का परीक्षण निकट के पशु-चिकित्सालय से करवाएँ।
4. मरे हुए पशुओं को 4-5 फुट गहरा गड्‌ढा खोदकर दबाएँ (नमक, चूना आदि छिड़कने के बाद), अन्य पशुओं (कुत्ते, जंगली जानवर पक्षी आदि) को मृत पशु के संपर्क में आने से बचाएँ।
5. मेले और मण्डियों में बीमार पशुओं को न ले जाएँ और न ही ऐसे पशु को खरीद कर लाएँ। बीमार पशुओं का आना जाना हर हालत में रोका जाना चाहिए।
टीकाकरण : रोग न होने की दशा में बचाव के लिए वर्ष में दो बार रोग निरोधक टीके लगवाएँ (पहला मई-जून और दूसरा अक्तूबर-नवम्बर में) पशुओं में मुँह-खुर के टीके भी लगवाने चाहिए ताकि दोनों बीमारियों से बचाव हो सके। पिछले कुछ वर्षों से दोनों बीमारियां एक साथ भी देखी गई हैं जिससे अधिक पशु मर जाते हैं, दूध सूख जाता है। इस प्रकार भारी नुक़सान हो जाता है।

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