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पालक की खेती

 
भूमि और जलवायु प्रजातियाँ बुआई
खाद एवं उर्वरक सिंचाई फ़सल सुरक्षा
कटाई एवं उपज    
 
पत्ती वाली सब्जियों में कैल्सियम, आयरन इत्यादि खनिज तत्व व विटामिन 'ए' 'बी' काम्पलैक्स व 'सी' बहुतायत में पाये जाते हैं।  पत्ती वाली सब्जियों में पालक का महत्तवपूर्ण स्थान है।  जो कि मुख्यतः अपनी मुलायम एवं कोमल पत्तियों के लिए उगाया जाता है।  पालक का कोमल तना भी प्रयोग में लाया जाता हैं पालक की खेती सर्दियों में अधिक की जाती है।
 
भूमि और जलवायु
पालक की खेती पूरे साल विभिन्न प्रकार की जलवायु में की जा सकती है।  परन्तु अत्यधिक तापक्रम इसके लिए हानिकारक होता है।  अतः सर्दियों के महीने पालक की खेती के लिए उपयुक्त होते हैं। 
भूमि की तैयारी 
पालक को पर्याप्त उर्वरता वाली सभी प्रकार की मिट्टीयों में उगाया जा सकता है।  भूमि में जल निकास का भी उचित प्रबन्ध होना चाहिए।  बलुई दोमट पालक के विकास के लिए अच्छी भूमि होती है। पालक की प्रजाति जैसे जोबनेर ग्रीन इत्यादि को 8 से 10 पी. एच. मान की क्षारीय भूमियों में भी उगाया जा सकता है।
 
पालक की बुआई के लिए खेत को 3-4 जुताइयाँ करके मिट्टी को भुरभुनी बना लेना चाहिए।  उचित जलनिकास के लिए खेत को पाटे द्वारा समतल करना भी आवश्यक होता है। 
 
प्रजातियां 
भारत में पालक की बहुत सी प्रजातियां उगाई हैं परन्तु अधिक पोषक तत्वों एवं मुलायम पत्तियों वाली कटाई के बाद अच्छी और जल्दी पुर्नवृद्धि वाली एवं देर से कल्ले फूटने वाली प्रजाति ही अच्छी मानी जाती है।  पालक की कुछ मुख्य प्रजातियां निम्नलिखित हैं:
पालक आल ग्रीन ,पालक पूसा ज्योति, पालक हरित, पालक भारती , जोवनेर ग्रीन ।
 
बुआई 
मैदानी क्षेत्रों में पालक की बुआई वर्ष में तीन बार की जा सकती है। 1 बसन्त ऋतु के शुरू में ,2 वर्षा के शुरू में , 3  मुख्य फ़सल सितम्बर व नवम्बर के मध्य में बीज द्वारा तैयार खेत में पंक्तियों में बुआई करना उचित रहता है।  क्योंकि पंक्तियों में बुआई करने से खरपतवार नियंत्रण , अन्तःकर्षण क्रियाएं एवं कटाई आसानी से की जा सकती है।  बीज को 20 सें०मी० की दूरी पर बनी पंक्तियों में 3-4 सें०मी० की गहराई पर बोना चाहिए।  यह ध्यान रहें कि बीज बोने से पहले खेत में पर्याप्त नमी रहनी चाहिए।  एक हेक्टेअर  क्षेत्र. की बुआई के लिए 25-30 कि. ग्राम. बीज काफी रहता है।
 
खाद एवं उर्वरक 
पत्तियों वाली सब्जियों के लिए नाइट्रोजन बहुत ही आवश्यक तत्व है।  खेत की तैयारी अर्थात् बुआई से 12-15 दिन पहले 15 - 20 टन प्रति  हेक्टेअर   के हिसाब से गोबर की खाद मिट्टी में मिला देनी चाहिए।  30 कि०ग्रा० नाइट्रोजन, 25 कि०ग्रा० फॉस्फोरस एवं 50 कि०ग्रा० पोटाश बुआई से पहले खेत तैयार करते समय मिट्टी में मिला दें।  हरी एवं मुलायम पत्तियों कटाई के बाद खेत में डालनी चाहिए। 
 
सिंचाई 
पालक में सिंचाई मौसम एवं मिट्टी की स्थिति पर निर्भर करती है।  यदि खेत में बुआई के समय पर्याप्त नमी न हो तो बुआई के तुरन्त बाद एक हल्की सिंचाई करनी चाहिए।  बसन्त एवं गर्मी के मौसम में छः से सात दिन के अन्तराल तथा सर्दियों में दस से पन्द्रह दिन के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिए। 
 
फ़सल सुरक्षा 
डेम्पिंग ऑफ एवं सरकोस्पोरा लीफ स्पोट मुख्य बीमारियाँ हैं।  डेम्पिंक ऑफ से बचने के लिए बीज को बुआई से पहले 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से कैप्टन या थिरम से उपचारित करना चाहिए।  जबकि सरकोस्पोरा लीफ स्पाट, जिसमें पत्तियों पर भूरे रंग के गोल घब्बे बन जाते हैं, के निंयत्रण के लिए ब्लाइटाक्स ;कॉपर आक्सीक्लोराइड दवाई ; दो ग्राम  प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।  बीटल, पत्ती खाने वाला लार्वा, टिड्डा और एफिड कीड़े पालक को नुकसान पहुँचाते हैं।  इन कीडों की रोकथाम के लिए मिथाइल पेराथियोन 50 ई०सी० की दो ग्राम प्रति लीटर पानी में छिड़काव करने से पत्तियों को नुकसान पहुँचाने वाले कीडों से बचाया जा सकता है।
 
खरपतवार नियंत्रण 
पालक में खुरपी द्धारा खरपतवार निकालने की एक मुख्य प्रक्रिया है।  सामान्यतः दो तीन अन्तः आकर्षण क्रियाएँ ही खरपतवार नियंत्रण के लिए पर्याप्त रहती है।
 
कटाई एवं उपज 
पालक की फ़सल की पहली कटाई, बुआई के 3-4 सप्ताह बाद की जाती है।  जब कि अन्य बाद  वाली कटाइयाँ 15 से 20 दिन के अन्तराल पर करनी चाहिएँ।  सामान्यतः 4-6 कटाई ली जा सकती हैं जिससे 80-100 कुन्टल प्रति हेक्टेअर पालक की हरी पत्तियों की उपज प्राप्त की जा सकती है।
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