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खरबूज और तरबूज की खेती

भूमि व खेत की तैयारी खरबूजे की क़िस्में तरबूज की क़िस्में
बीज की मात्रा व बुआई का तरीक़ा उर्वरक का प्रयोग पौध संरक्षण
बीमारियाँ कटाई
 
भूमि व खेत की तैयारी
नदी के किनारों पर यदि सुरक्षात्मक उपाय उपलब्ध हों तो दिसम्बर या जनवरी के महीनों में भी बुआई की जा सकती है, जबकि अन्य स्थानों में फरवरी और मार्च प्रारंभ में बुआई की जाती है। खरबूज को बलुई दोमट मिट्टी में अच्छी खाद मात्रा के साथ उगाकर अच्छी उपज ली जा सकती है।
 
खरबूजे की क़िस्में
 
पूसा शर्बत
अगेती क़िस्म जो 80 से 90 दिनों में पकती है। इसका छिलका , जालीदार , धारीदार व धूसर रंग का होता है और गूदा मोटा व गहरे नारंगी रंग का होता है। कुल धुलनशील शर्करा की मात्रा 10 से 12 प्रतिशत तक होती है। यह किसी एक स्थान से दूसरे स्थान तक लाने ले जाने के लिए भी उपयुक्त है। इसकी औसत पैदावार 150 से 170 कुंटल प्रति हेक्टेअर होती है।
 
पूसा मधुरस
यह मध्य मौसमी क़िस्म है जो 100 दिनों में पकती हैं इसके फल चपटे और चमकीले पीले रंग के 10 धारियों वाले होते हैं। गूदा गहरे नारंगी रंग का और बहुत रसदार होता है। कुल घुलनशील शर्करा की मात्रा 11-13 प्रतिशत होती है। कुल पैदावार 180 से 200 कुंटल प्रतिशत हेक्टेअर तक होती है, लेकिन इसके फल लम्बे समय तक नहीं रखे जा सकते हैं।
 
पूसा रसराज
 यह खरबूजे की संकर क़िस्म है। इसके फल अण्डाकार व छिलका पतला हल्का हरे रंग का होता है। एक फल वजन लगभग एक कि०ग्रा० होता है, इसका गूदा हल्का हरे रंग का होता है। यह क़िस्म 75 से 80 दिन में पक जाती है और एक बेल पर 45 फल लगते हैं। इसकी पैदावार 200 से 250 कुंटल प्रति हेक्टेअर होती है।
 
तरबूज की क़िस्में
सुगर बेगी
यह अमरीका से लाई गई क़िस्म का चयन है। इसके फल गोल व हल्का नीलापन लिए हुए हरे रंग के छिलके वाले होते हैं जिन पर हल्की काली धारियां पड़ी होती हैं। एक फल का वजन 2 से 5 किलो होता है। इसका गूदा गहरा गुलाबी और मीठा होता है जिसमें छोटे-छोटे भूरे रंग के बीज होते हैं। कुल घुलनशील शर्करा की मात्रा 11 से 13 प्रतिशत होती है यह 90 दिनों में पक जाती है और एक बेल पर 2 या 3 फल लगते हैं। इसकी पैदावार 150  कुंटल प्रति हेक्टेअर होती है।
 

असाही यमातों

यह जापान से लाई गई क़िस्म का चयन है जिसके फल गोल होते हैं और उनका छिलका हल्के हरे रंग का होता है। फलों का भार लगभग 6 से 8 कि०ग्रा० होता है । गूदा गुलाबी रंग का और मीठा होता है जिसमें भूरे रंग के छोटे-छोटे बीज होते हैं। कुल घुलनशील शर्करा की मात्रा 10 से 12 प्रतिशत होती है। इसके फल लगभग 100 दिनों में पक जाते हैं और प्रत्येक बेल पर 2-3 फल लगते हैं। इसकी औसत पैदावार 250 से 300 कुंटल प्रति हेक्टेअर होती है। तराई व निचली पहाड़ियों में इसकी मिठास व पैदावार अधिक होती है।
 
बीज की मात्रा व बुआई का तरीक़ा
बुआई का समय
मैदानी भाग में फरवरी के मध्य से मार्च के पहले सप्ताह तक और नदी के किनारें पर , सुरक्षात्मक उपाय अपनाकर दिसम्बर या जनवरी माह में पॉलीथीन की थैलियों में पौधे उगाकर इन्हें फरवरी अन्त में रोप कर अगेती फ़सल ले सकते हैं।
 
बीजदर
तरबूज के लिए 3.0-4.5 कि०ग्रा० प्रति हेक्टेअर बीज की आवश्यकता पड़ती हैं ।
 
बुआई का तरीक़ा
इन फलों की बुआई 60 से. मी. चौड़ी नालियों के किनारों पर की जाती है। दो नालियों के बीच 3.5 मीटर का फासला रखा जाता है। बुआई नालियों के दोनों किनारों पर की जाती है। एक बेल से दूसरी बेल का फासला 75 से. मी. रखा जाता है।
 
उर्वरकों का प्रयोग
एक हेक्टेअर क्षेत्र मे 30 टन गोबर की खाद, 400 किलो कैल्सियम अमोनियम नाइट्रेट ; कैन या 200 किलो उत्तमवीर यूरिया, 300 किलो सुपर फ़ॉस्फ़ेट और 100 किलों म्यूरेट ऑफ पोटाश का उपयोग करना चाहिए। कैन या यूरिया का प्रयोग फ़सल की बढवार की आरंभिक अवस्थाओं में करना चाहिए। जब फूल आने शुरू हो जाएँ तो फ़सल पर किसी भी क़िस्म का उर्वरक नहीं डालना चाहिए।
 
सिंचाई
फूल आने की अवस्था में हर पाचवें दिन हल्की सिंचाई करनी चाहिए । फ़सल पकने पर सिंचाई तभी करनी चाहिए जब उसकी आवश्यकता हो।
 
पौध संरक्षण
कीड़े
कद्दू वाला लाल भूंग
इसकी रोकथाम के लिये 2 ग्राम कार्बारिल या 3 मि. ली .क्लोरवीर प्रति लीटर पानी में बना घोल सुबह के समय छिड़कें । आवशकता अनुसार १५ दिन बाद पुनः करे ।
फल वाली मक्खी
फ़सल को इनसे बचाने के लिए 2 मि. ली. मिथाइल पाराथोन  प्रति लीटर पानी में गुड़ के घोल में मिलाकर छिड़कना चाहिए। इसके साथ समय पर रोगग्रस्त फलों को निकाल कर नष्ट करे ।
 
बीमारियाँ
  1. चूर्णित आसिता (पाउडरी मिल्डयू) - यह एक प्रकार की फफूंदी से फैलने वाली बीमारी हैं जिसका आग्रमण होने पर बेलों, पत्तियों और तनों पर सफेद परत चढ़ जाती है। इसकी रोकथाम के लिए प्रति हेक्टेअर 2 ग्राम बाविस्टीन प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल कर छिड़काना चाहिए।
  2. मृदुरोमिल आसिता (डाउनी मिल्ड्यू ) - इस बीमारी के प्रभाव से पत्तियों की निचली सतह पर भूरे रंग के घब्बे पड़ जाते हैं। यदि गर्मियों के मौसम में बरसात हो जाए तो यह बीमारी बहुत आम हो जाती है। बीमारी की रोकथाम के लिए प्रति लीटर पानी में 2 ग्राम मैन्कोजेब  या  वीर एम-45 घोलकर छिड़कना चाहिए।
 
कटाई
तरबूज के फल तभी तोड़े जाने चाहिएँ जब वे पूरी तरह पक गये हों।
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