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आलू की खेती

मिट्टी व जलवायु बीजोपचार बुआई का समय
क़िस्में खाद और उर्वरक सिंचाई
खरपतवार नियंत्रण पौध संरक्षण उपज
 

आलू देश की महत्वपूर्ण सब्जी वाली फसलों में से एक है, इसकी औसत पैदावार 161 कु. प्रति हेक्टेअर है, यदि उत्तम क़िस्मों और नवीन प्रौंद्योगिकी को उपनाया जाए तो इसकी पैदावार को और अधिक बढ़ाया जा सकता है।

 

मिट्टी व जलवायु

आलू अच्छी जल निकास वाली कार्बनिक पदार्थ से भरपूर बलूई दोमट मिट्टी में लगाएँ। पानी ठहरने वाली क्षारीय मिट्टी में आलू की फ़सल नहीं उगानी चाहिए। आलू की अच्छी बढ़वार के लिये हल्की जलवायु की आवश्यकता होती है।

 

बीजोपचार

आलू का बीज सरकारी संस्थानों और बीज निगमों से खरीदें। आलू का बीज तीन-चार साल बाद अवश्य बदल दें, वरना बीज में विषाणु रोग बढने की संभावना रहती है। अच्छा अंकुरित 30 - 40 ग्रा० भार का आलू लगायें। आलू के बीज को बुआई से 10 दिन पूर्व ठंडे गोदाम से निकालें। पहले बीज को 24 घंटे के लिए प्रीकूलिंग चेम्बर में रखें इसके पश्चात   बीज को छाया वाली जगह में कल्ले फुटाव के लिये रखें। इसी दौरान सडे हुये व बिना अंकुरित हुये आलू निकाल दें।

 

बुआई का समय

आलू की बुआई का उचित समय अक्टूबर का दूसरा पखवाडा है। यह समय इसलिये उपयुक्त है क्योंकि जिन स्थानों पर पाला दिसम्बर के आखिर में या जनवरी के प्रथम सप्ताह में पड़ता है अतः पाला पड़ने तक आलू को बढने के लिए पूरा समय मिल जाता है।

 

खेत में पूर्व से पश्चिम की दिशा में मेंड 5-6 से०मी० दूरी पर बनाएँ और बीज को मेंड की उत्तरी ढलान पर 20-25 सें०मी० की दूरी पर लगाएँ। 30-40 ग्राम. का आलू लिया गया हो तो एक हेक्टेअर के लिये 30-50 कुन्टल बीज के आवश्यकता होती है।

 

आलू की उत्तम क़िस्में

 
क़िस्में पकने की अवधि
(दिनों मे)
क्षेत्र पैदावार
 कु. प्रति हेक्टेअर
( क) अगेती क़िस्में
(1 ) कुफरी चन्द्र मुखी ;सफेद कन्द्र 70 - 80 उत्तर प्रदेश , बिहार और पश्चिमी बंगाल के गंगीय मैदानी क्षेत्र  150 - 200
(2) कुफरी अशोका ;सफेद कन्द्र 71 - 80 उत्तर प्रदेश , बिहार और पश्चिमी बंगाल के गंगीय मैदानी क्षेत्र 200 - 250
(ख) मध्यम क़िस्में
(1) कुफरी बहार ;सफेद कन्द 90 - 110 उत्तर प्रदेश ,बंगाल 200 - 250
(2) कुफरी लालिमा ;लाल कन्द 90 - 110 हरियाणा और दिल्ली दिन के मैदानी क्षेत्रों के लिए 200 - 250
(3) कुफरी जवाहर ;सफेद  कन्द 100 - 110 उत्तर प्रदेश व बिहार के मैदानी क्षेत्रों के लिए 200 - 250
(4) कुफरी सतलुज ; सफेद कन्द 100 - 110 पंजाब , उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा के मैदानी क्षेत्रों के लिए 250 - 300
(ग) पछेती क़िस्म
(1) कुफरी बादशाह ;सफेद कन्द व पछेती 115 - 130 उत्तरी भारत के पहाड़ी में मैदानी क्षेत्रों के लिये 250 - 300
(2) कुफरी सिन्दुरी ;लाल कन्द 120 - 150 उत्तर प्रदेश और बिहार के मैदानी क्षेत्रों के लिये

 250 - 300

 

खाद और उर्वरक

आलू की अच्छी पैदावार लेने के लिये नाइट्रोजन, फ़ॉस्फ़रस एवं पोटाश की अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है इसके लिए 120-150 कि०ग्रा० नाइट्रोजन ;260-300 कि०ग्रा० यूरिया, 80 कि०ग्रा० फ़ॉस्फ़रस पोटाश ;500 कि०ग्रा० सिंगल सुपर फ़ॉस्फ़ेट और 50-100 कि०ग्रा० पोटाश ;130-160 कि०ग्रा० म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति हक्टेयर की दर से देने की सिफारिश की जाती है। मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों की मात्रा बढ़ाई या घटाई जा सकती है। फ़ॉस्फ़रस व पोटाश की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुआई से पहले मेंड बनाने के पहले ज़मीन के ऊपर छिड़क दें। इसके बाद मेंड बनाएँ नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा बुआई के 30-35 दिन बाद मिट्टी चढाने से पहले व सिंचाई देने के बाद दें जिन किसानों के पास गोबर की खाद उपलब्ध हो वे 10-20 टन प्रति है० की दर से आलू की बुआई से एक माह पूर्व खेत में डालें गोबर की खाद की मात्रा के अनुसार, उर्वरकों की मात्रा घटाई जा सकती है ।

 

सिंचाई 

आलू की फ़सल में हल्की व जल्दी सिंचाई की आवश्यकता होती है। सिंचाई करते समय ध्यान रखें कि मेंडों में पानी हमेशा 3/5 उंचे हिस्से तक ही दें आलू अच्छी नमी वाली ज़मीन में लगाएँ एवं पहली सिंचाई पौधे उग आने के करीब 15-20 दिन बाद करें दूसरी सिंचाई पहली सिंचाई के 15 दिन बाद करें स्टोलोनाइजेशन एवं कन्द बनने की अवस्था में सिंचाई की कमी न होने दें वरना आलू की पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पडेगा। इन अवस्थाओं के बीच में फ़सल में 10-15 दिन के अन्तर पर सिंचाई करते रहें आलू को खोदने से पहले सिंचाई बंद कर दें ।

 

खरपतवार नियंत्रण 

आलू की फ़सल में खरपतवार नहीं पनपने दें इसके लिए खुरपी से खरपतवारों को बाहर निकालते रहे यदि खरपतवारनाशी दवाइयों को प्रयोग करना हो तो मैट्टीब्यूजीन ;मोटोवीर कि ग्रा.प्रति हेक्टेअर  600-700 लीटर पानी में मिलाकर जमने से पहले छिड़कें ।

 

पौध संरक्षण

आलू की फ़सल में मुख्यतः कुतरने वाले कीड़े, जैसिड और माहू नुकसान पहुँचाते हैं कुतरने वाले कीडों की रोकथाम के लिये क्लोरवीर 4 प्रतिशत धूल वाला 25-30 कि०ग्रा० प्रति हेक्टेअर की दर से ज़मीन में मिला दें जैसिड व माहू की रोकथाम के लिये क्लोरवीर 2 मि. ली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर उपरोक्त कीडों का प्रकोप दिखाई देते ही छिड़काव करें। आवश्यकता पड़ने पर 15 दिन बाद दुबारा छिड़काव करें ।

अगेती अंगमारी, पछेती, पत्तियों का मुड़ना, चित्ती रोग व सूत्रकृमि आलू की मुख्य बीमारी हैं। अगेती व पछेती अंगमारी की रोकथाम के लिए फ़सल पर बीमारी के लक्षण, अगेती अंगमारी- पुरानी पत्तियों पर गहरे भूरे धब्बे, पछेती अंगमारी-पत्तियों के किनारे पर छोटे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देने पर या बादल व अधिक आर्द्रता वाला मौसम होने पर वीर एम. 45 या डाइथेन जेड 78 या ब्लाइसक्स 2 ग्राम. प्रति ली. पानी में मिलाकर अच्छी तरह पत्तियों पर छिड़क दें जिससे पत्तियाँ दोनों तरफ से भीग जाएँ यदि आवश्यकता पडे तो 15 दिन बाद इन्हीं दवाईयों का छिड़काव करें ।

पत्तियों का मुड़ना एवं चित्ती रोग की रोकथाम के लिए रोग के आक्रमण की प्रारम्भिक अवस्था के लक्षण दिखाई देते ही रोगगस्त पौधों को निकाल कर ज़मीन में दबा दें ।

जड़ गांठ वाले सूत्रकृमि से बचाव के लिये आलू बोने से पहले गर्मियों में खेत की 2-3 बार गहरी जुताई करें और बीज की रोपाई से पहले खेत में 2 कि०ग्रा० एल्डीकार्ब-कार्बोफयूरान प्रति है, की दर से मिलाने से सूत्रकृमि के प्रकोप से बचा जा सकता है ।

 

पाले से बचाव 

उत्तरी व पश्चिमी भारत में दिसम्बर के आखरी व जनवरी के प्रथम सप्ताह में पाला पड़ने की सम्भावना रहती है । यदि पाला पड़ने की सम्भावना हो तो किसान आलू की फ़सल में तुरन्त सिंचाई करें खेत में रात को ही हवा की दिशा के अनुसार धुआँ करके पाले से फ़सल को बचा सकते हैं ।

 

खुदाई 

जब पत्तियाँ पीली पड़ जाएँ या सूख जाएँ व आलू का छिलका कडा हो जाए तब ही मेंडों की खुदाई करना चाहिए। मेंड के बीच में देशी हल चलाकर भी फ़सल की खुदाई करके ज़मीन से आलू निकाले जा सकते हैं ।

 

उपज

इसकी औसत पैदावार 161 कु० प्रति हेक्टेअर यदि उत्तम क़िस्मों और नवीन प्रौद्योगिकी को उपनाया जाए तो इसकी पैदावार को और अधिक बढा या जा सकता है।

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