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फूल गोभी की खेती

 उत्तम क़िस्में   बीज की मात्रा व बुआई का तरीक़ा  बुआई का समय
खाद और उर्वरक पौध संरक्षण कटाई व उपज
 

पोषक मात्रा की दृष्टि से फूल गोभी अधिक समृद्ध नहीं है लेकिन इसमें विटामिन 'सी' स्थायी रूप से पाया जाता है। उत्तर भारत की जलवायु में इसकी बुआई देर तक की जा सकती है। अतः इसकी एक या दो किस्मों की अपेक्षा चार या छः विशिष्ट क़िस्में बोई जा सकती हैं।

 

क़िस्में

एक विशेष समय के दौरान उगाने के लिए इसकी विशिष्ट किस्मों की आवश्यकता होती है तथा किसी भी अवधि मे उगाने के लिए गलत किस्मों का चयन व्यापारिक दृष्टि से असफल हो सकता है।

 

पूसा अर्ली सिंथेटिक

इसके फूल छोटे व मध्यम आकार वाले तथा सामान्य रूप से गुथे हुए होते हैं। इनका रंग पीलापन लिए हुए सफेद होता है। औसत उपज 108 कुन्टल/एकड़ है। सितम्बर के मध्य तक फूल तैयार हो जाते हैं।

पूसा दीपाली  

इसके पौधे खड़े हुए होते हैं जिनमें 24-28 बाहरी पत्तियाँ होती हैं। इसके फूल स्वयं संतुलित, सफेद व ठोस गुथे हुए होते हैं तथा प्रति इकाई क्षेत्र में अधिक पौधे उगाए जा सकते हैं। उत्तर भारत में मध्य अक्तूबर से मध्य नवम्बर तक इसके फूल बाजार में उपलब्ध रहते हैं।

इम्प्रूव्ड जापानीज

इसके पौधे व 24-26 बाहरी पत्तियाँ लिए हुए होते हैं। इसके फूल सामान्य, स्वयं संतुलित पीलापन लिए हुए सफेद व ठोस होते हैं। नवम्बर के अन्त से मध्य दिसम्बर तक फूल तैयार हो जाते हैं।

पूसा हाईब्रिड 

इसके पौधे मध्यम लम्बे तथा कुछ झुके हुए व पत्तियाँ नीलापन लिए हुए हरी तथा सीधी खड़ी होती है। फूल पीलापन लिए हुए सफेद व ठोस होते हैं। अगस्त के आखिर में या सितम्बर के शुरू में बोए जोने के लिए उपयुक्त है। रोपाई के 80 दिन बाद फूल तैयार हो जाते हैं। मध्य नवम्बर से मध्य दिसम्बर तक फूल मिलते रहते हैं। यह इस ग्रुप में पाए जाने वाली एक गम्भीर रोग रोमिल फफूंद की प्रतिरोधी है। इसकी उपज 230 कु./ है. है।

पूसा शहद 

यह भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्धारा विमोचित जाति है। इसकी पत्तियां नील हरित, पतले शीर्ष और विकसित मध्य शिरा वाली होती हैं। फुल गुम्बदनुमा, सफेद और बहुत ठोस होते हैं। औसत पैदावार 240 कि. हेक्टेअर है।

पूसा शुभ्रा 

पौधे लम्बे व बड़ी डंठल वाले होते हैं। पत्तियाँ कुछ नीलापन लिए हुए हरे रंग की व बीच में से पीछे की ओर कुछ मुड़ी हुई होती है। इसके फूल मध्यम आकार वाले कुछ चपटे, गुथे हुए व सफेद तथा इनका वजन 700-800 ग्राम तक होता है। इनको तैयार होते ही काट लेना चाहिए क्यों ये जल्दी ही खिलने लगते हैं।

पूसा हिमज्योती

इसकी पत्तियाँ सीधी व नीलापन लिए हुए हरी तथा चिकनी होती हैं। इसके फूल बहुत सफेद, संतुलित ठोस तथा 500-600 ग्राम वजन वाले होते हैं। इसका रोपाइ से कटाई तक का समय 60-75 दिन का है। पहाड़ी क्षेत्रों में गोभी की केवल यही किस्म है जो अप्रैल से जुलाई तक बोई जाती है। उत्तरी मैदानी भागों में शीत ऋतु , (दिसम्बर में तैयार होने वाली) में बोए जाने के लिए भी उपयुक्त है।

पूसा सिंथेटिक 

सीधे खडे पौधे, पकते समय 24-28 बाहरी पत्तियों वाले स्वयं विवर्णित होते हैं। इसके फूल सफेद व पीलापन लिए हुए सफेद होते हैं। फूल भी खूब गुथे हुए व ठोस होते हैं। मध्य दिसम्बर से मध्य जनवरी तक उपलब्ध रहती है।

पूसा स्नोबाल-1 

पौधे सीधे व खडे तथा 24-28 बाहरी पत्तियों वाले और स्वयं संतुलित होते हैं। इसके फूल बहुत सफेद होते है। तथा रोपाई के 90 दिन बाद पककर तैयार हो जाती है।

पूसा स्नोबाल के.-1

पकते समय पौधे कुछ फैले हुए व 24-28 बाहरी पत्ती वाले होते हैं। पत्तियाँ हल्के हरे रंग की कुछ सिकुड़ी हुई होती हैं। इसके फूल बहुत सफेद होते हैं। रोपाई के 95 दिन बाद तैयार हो जाते हैं।

पूसा स्नोबाल-1 तथा पूसा स्नोबाल के.-1

दोनों ही पछेती क़िस्में हैं तथा 15 अक्तूबर से इनकी रोपाई की जा सकती है। पूसा स्नोबाल के -1 काले रतुए रोग की प्रतिरोधी भी है।
 

बीज की मात्रा व बुआई का तरीक़ा

अगेती फ़सल के लिए बलुई-दोमट मिट्टी अधिक उपयुक्त रहती है बशर्ते कि जल की निकासी सही हो। मानसून के समय खेतों में बहुत समय तक पानी जमा नहीं होने देना चाहिए। 5-6 हफते की रोपाई के लिए ठीक है। रोपाई इस ढंग से की जानी चाहिए कि मानसून की भारी वर्षा से पूर्व ही पौध अच्छी तरह जम जाए। 45-50 सें०मी० की दूरी पर बनी हल्की मेड़ों पर 35-45 सें०मी० के फासले पर पौध की रोपाई करनी चाहिए। इससे मानसून के दौरान अतिरिक्त जमा पानी के निकास में सहायता मिलेगी। सीधी खड़ी हाने वाली क़िस्में जैसे पूसा दीपाली , इम्प्रूब्ड जापानीज आदि के लिए पौधों का फासला 35-45 सें०मी० तक किया जा सकता है। पछेती फ़सल के लिए 4-5 हफ्ते की पौध आदर्श रहेगी तथा अधिक से अधिक नवम्बर के पहले फ़सल दिनों में इसकी रोपाई पूरी कर लेनी चाहिए। पोधे से पौधे की दूरी 40-45 सें०मी० तथा पंक्तियों के बीच का फासला 45 से 50 सें०मी० होनी चाहिए।

 

बुआई का समय

1. पूसा सिंथेटिक , पूसा दीपाली : मई अन्तिम व जून के प्रारंभ में

2. इम्प्रूब्ड जापानीज  : जुलाई के मध्य से अन्त तक

3. पूसा सिंथेटिक पूसा शुभ्रा :  अगस्त के मध्य से अन्त तक

4. पूसा स्नोबाल-1 तथा पूसा स्नोबाल के.-1  : सितम्बर के अन्त से अक्तूबर के शुरू में

 

गर्म मौसम में नर्सरी तैयार करने के लिए विशेष ध्यान और सावधानी की आवश्यकता होती है जैसे कि नीचे बताया गया है :

1. लम्बाई चाहे कितनी भी हो क्यारियों की चौड़ाई लगभग 30 सें०मी० अर्थात्‌ संकरी होनी चाहिए। क्यारियों के बीच की नाली अधिक चौड़ी होनी चाहिए।

2. बुआई शुरू करने से पहले इन नालियों में इतना पानी छोड़ देना चाहिए कि क्यारियाँ पूरी तरह नमी ले लें। जब इस प्रकार तैयार की गई क्यारियाँ ठीक स्थिति में आ जाएं तो इनको बुआई के लिए तैयार समझना चाहिए।

3. बुआई के बाद सूखी घास की पुआल भी क्यारियाँ में अंकरण के लिए समुचित नमी कायम रखने में सहायक होती हैं। दिन में अधिक गर्मी के दौरान अंकुरित पौध का बचाव करने के लिए नालियों को सिरकी से ढक देना चाहिए।

4. बुआई के 3 दिन बाद कूडों को फिर से तर कर देना चाहिए ताकि अंकुरण अधिक से अधिक हो सके। हजारे से प्रातः सांय पानी देना जरूरी है तथा जलवायु सबंधी स्थितियों के अनुसार 2-3 दिन के बाद कूडों को तर कर देना चाहिए।

5. पछेती किस्मों के लिए परम्परागत नर्सरियों से संतोषजनक पौध मिल सकती है, लेकिन फिर भी क्यारियों में 0.2 प्रतिशत की दर से छिड़काव  जरूरी है।

6. अगेती फ़सल के लिए बीज दर 600 से 750 ग्राम तथ मध्य व पछेती फ़सलों के लिए 375 से 400 ग्राम प्रति हेक्टेअर है।

 

खाद और उर्वरक

फूल-गोभी के लिए भूमि तैयार करते समय 60-70  टन प्रति हेक्टेअर  गोबर की खाद डालनी चाहिए। अन्तिम रूप से क्यारी करते समय 45 कि०ग्रा० फास्फेट भी मिलाई जा सकती है। 50-60 कि०ग्रा० प्रति हेक्टेअर  की दर से नाइट्रोजन की दो खुराकें दी जाती हैं, पहली रोपाई के 15 दिन बाद और दूसरी पहली खुराक देने के लगभग 30-40 दिन बाद। पंक्तियों के दोनों तरफ 5 से 7.5  सें०मी० गहराई तक इसका उपयोग किया जाना चाहिए । इसके बाद मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए क्षारीय भूमि में 15-20 कि०ग्रा० प्रति हेक्टेअर की दर से सुहागा ;बोरेक्स मिलाने से फल की बढ़वार अच्छी होगी। फ़सल की बढवार कम होने पर कीटनाशी के साथ एक प्रतिशत की दर से यूरिया का छिडकाव लाभप्रद होता है।

 

पौध संरक्षण

 

चेंपा या माहू : ये बहुत छोटे-छोटे हरे रंग के कीड़े होते हैं जो गोभी की पत्तियों तनों व कलियों का रस फूल देने की अवस्था में चूसते हैं।

रोकथाम के उपाय : बन्दगोभी की सूंडी, डायमंड बैकमाथ, सेमीलूपर तथा चेंपा या माहू की रोकथाम के लिए जैसे ही इनका आक्रमण हो वैसे ही 0.05 प्रतिशत से 0.2 प्रतिशत मैलाथियॉन  का छिड़काव 10 से 15 दिन के अन्तराल करें।

डैम्पिंग ऑफ : अगेती फूल गोभी की क्यारियों में यह एक आम समस्या है। इसके लिए 25 घ .सें मी. से 30 घ सें मी. प्रति लीटर की दर से फार्मेल्डीहाइड डालें और एक सप्ताह के लिए क्यारियों को पौलिथिन की चादर से ढक दें। इससे इस रोक के नियंत्रण में मदद मिलेगी। यह उपचार बुआई के 15 दिन पहले किया जाना चाहिए या बुआई के पहले पानी में 2-3 ग्रा. ली. की दर से कैप्टान मिलाकर डालना चाहिए |

काला गिलन , ब्लैकरॉट : इसमें पहले पत्तियाँ पीली पड जाती हैं फिर शिराएँ काली होने लगती हैं। इसकी रोकथाम के लिए बीज को 50 सें. पर गर्म पानी में 30 मिन्ट तक रखकर उपचारित करें।

 

कटाई व उपज

कटाई, तुड़ाई तथा बिक्री

गोभी के फूल उस समय काटने चाहिए जब वे ठोस, सफेद व घब्बे रहित बिल्कुल साफ़  हों। फूल तेज घार वाले चाकू से काटें जाएं और फूल के साथ पत्तियों के कम से कम दो चक्र भी हों। इन च्रकों की पत्तियों के उपरी सिरे काट देने चाहिए लेकिन यह ध्यान रहे कि फूल की प्रयाप्त सुरक्षा बनी रहे। पत्तियों के अनदरूनी चक्र बिक्री के समय भी बने रहने चाहिए क्योंकि इनमें उच्च पोषक तत्व होते हैं।

 

उपज

अगेती फ़सल की उपज 12-15 टन तक जबकि मध्य ऋतु एवं पछेती किस्मों की उपज 20-25 टन प्रति हेक्टेअर तक होती है।

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