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खीरे और लौकी की खेती

 

जलवायु और मिट्टी क़िस्में बीज
 बुआई उर्वरक सिंचाई
पौध संरक्षण बीमारियाँ तथा रोकथाम  
खीरा और लौकी गर्मियों की महत्वपूर्ण सब्जियों में आती हैं, इन्हें बरसात में भी उगाया जा सकता है। खीरे का सलाद के रूप में उपयोग होता है। ये दोनों सब्जियाँ गर्मियों में तरावट देती है व इनके बीज औषघि के रूप में भी उपयोग किये जाते हैं।
जलवायु और मिट्टी
ये गर्म जलवायु की फ़सलें हैं तथा इन्हें पाले से अधिक हानि होती है। इन्हें सभी प्रकार की भूमियों में उगाया जा सकता है लेकिन बलुई दोमट मिट्टी इनके लिए उपयुक्त है। भूमि का पी. ए.च. मान 6-7 होना उत्तम है ग्रीष्म ऋतु में प्रति सप्ताह सिंचाई की आवश्यकता होती है।
क़िस्में

खीरा

पोइनसेट : यह क़िस्म 50-55 दिन में तैयार हो जाती है। इस के फल 15-20 से . मी. लम्बे व गहरे हरे रंग के होते हैं। इसकी औसत पैदावार 100-120 क्विंटल प्रति हेक्टेअर होती है।
पूसा संयोग : यह संकर क़िस्म 45-50 दिन में तैयार हो जाती है। इसके फल 25-30 से. मी. लम्बे व हरे रंग के होते हैं। इसकी औसत पैदावार 250-300 क्विंटल प्रति हेक्टेअर होती है।

लौकी

पूसा समर प्रोलीफिक लोंग : यह लौकी की गोल क़िस्म है। औसतन उपज 150-200 क्विंटल प्रति हेक्टेअर होती है।
पूसा समर प्रोलीफिक राउण्ड : यह लौकी की गोल क़िस्म है। औसतन उपज 150-200 क्विंटल प्रति हेक्टेअर होती है।
पूसा नीवन : यह निर्यात के लिए उपयुक्त क़िस्म है, फल बेलनाकर होते है। फल 30-40 सें०मी० लम्बे, वजनदार व हल्के हरे रंग के होते हैं। औसतन उपज 250-300 क्विंटल प्रति हेक्टेअर होती है। यह 60 दिनों में तैयार हो जाती है।
पूसा संदेश : इसके फल आकर्षक गोल, हरे व मध्यम आकार के होते हैं। यह प्रजाति जायद , ग्रीष्मद व खरीफ दोनों में अच्छी पैदावार देती है। फलों का औसत्‌ भार 600 ग्राम व उपज 320 कुंतल प्रति हेक्टेअर होती है।
पूसा संकर : इसके फल हरे, सीधे लंबे व हल्के रूप के होते हैं तथा सुगम पैकिगं व दूर तक ले जाने के लिए उपयुक्त होते हैं। फल तुड़ाई के लिए 45 -55 दिन में तैयार हो जाते हैं। फलों की पैदावार ग्रीष्म ऋतु में 625 कुंतल व खरीफ में 470 कुंतल प्रति हेक्टेअर है जो पूसा नवीन की तुलना में डेढ़ गुना है।
बीजदर
बुआई का समय फरवरी के मध्य से मार्च के पहले सप्ताह तथा बरसात की फ़सल जुलाई-अगस्त के महीने में लगाई जा सकती है।
3.0-5.0 कि०ग्रा० बीज / हेक्टेअर , लौकी के लिए ।
2.5 -3.0 कि०ग्रा० बीज प्रति हेक्टेअर , खीरे के लिए ।

बुआई

इन फ़सलों की बुआई 60 सें०मी० नालियों के किनारों पर की जाती है। लौकी के लिए 2 नालियों के बीच 3.5 मीटर व खीरे के लिए 2 नालियों के बीच 2.5 मीटर का फासला रखा जाता है। एक बेल से दूसरी बेल का फासला 60 सें०मी० रखा जाता है।
खीरा और लौकी के पौधों से अधिक फल लेने के लिए प्रजनन तथा हार्मोन के प्रयोग से मादा फूलों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। एथ्रेल 200-250 मि०ग्रा० प्रति लीटर का घोल जब दो पत्तियाँ वाले पौधे हो जाएँ तब छिड़कना चाहिए। ऐसा करने के पौधो में मादा पुष्पों की संख्या अधिक हो जाती है और अधिक फल लगने के कारण उपज बढ़ जाती है ।

उर्वरकों का प्रयोग

प्रति हेक्टेअर में 30 टन गोबर खाद, 400 कि०ग्रा० कैल्सियम अमोनियम नाइट्रेट, कैन या 200 कि०ग्रा० उत्तम वीर यूरिया , 300 कि०ग्रा० सुपर फ़ॉस्फ़ेट और 100 कि०ग्रा० म्यूरेट ऑफ पौटाश का उपयोग करना चाहिए। जब फल आने शुरू हो जाएं तो फ़सल पर एक दो तुड़ाई के बाद एक  प्रतिशत यूरिया का घोल छिड़कने से पौधों की बढ़वार व फलत बनी रहती है।

सिंचाई

फूल आने की अवस्था में हर पांचवे दिन सिंचाई करनी चाहिए इन फ़सलों को पानी की अधिक आवश्यकता होती है। अतः खेत में नमी बनाये रखें।
पौध संरक्षण

कीड़े

कद्दू वाला लाल भूंग

फ़सल को इनसे बचाने के लिए उस पर काबार्रिल 0.1 से 0.2 प्रतिशत, 1 से 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में बना घोल या डाइमैथेएट 0.1 प्रतिशत , 2 मि. ली. प्रति लीटर पानी में बना घोल का छिड़काव करना चाहिए। बुआई के साथ ही फयूराडान 20 कि. प्रति हेक्टेअर डालने से प्रारंभिक अवस्था के कीटों से सुरक्षा मिल जाती है।

फल वाली मक्खी

फ़सल को इनसे बचाने के लिए मिथाइल पाराथोन  - 0.1 प्रतिशत गुड के घोल में मिलाकर छिड़कना चाहिए। .इसके साथ समय पर रोग ग्रस्त फलों को निकालकर नष्ट कर देना चाहिए।

बीमारियाँ

चूर्णित आसिता (पाउडरी मिल्डयू) : यह एक प्रकार की फफूंदी से फैलने बीमारी है जिसका आक्रमण हाने पर बेलों, पत्तियों और तनों पर सफेद पर्ते चढ जाती है। । वीरजिम - 0.2 प्रतिशत से इस बीमारी को रोका जा सकता है।
मृदुरोमिल आसिता (डाउनी मिल्ड्यू ) : इस बीमारी के प्रभाव से पत्तियों की निचली सतह पर भूरे रंग के घब्बे पड जाते हैं और इसके साथ-साथ पत्तियों पर भूरापन लिए हुए काले रंग की पर्ते चढ़ जाती हैं। यदि गर्मियों के मौसम में बरसात हो जाए तो यह बीमारी बहुत आम हो जाती है। इस बीमारी को रोकने के लिए वीर एम-45 ,0.2 प्रतिशत 2 ग्राम को एक लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़कने से रोका जा सकता है।
कटाई
खीरे की फ़सल की अवधि 45 दिनों में 75 दिन तक की होती है। उपज 80-120 क्विंटल प्रति हेक्टेअर होती है। खीरे की बे मौसम फ़सल पाली हाउस में उगाकर अच्छी आमदानी ली जा सकती है।

लौकी की फ़सल की अवधि 70 से 130 दिनों की है। उपज 200-250 क्विंटल प्रति हेक्टेअर होती है।
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